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शाम का रंग

शाम का रंग शाम का रंग किसे अच्छा नहीं लगता और ऐसे में यदि कोई अपना सा कोई आने वाला हो तो कहना हीं क्या?
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कुछ भी कह दो, सह लूँ, हँस लूँ, वेवफाई का पर इलज़ाम न दो। तुम मेरे थे, मेरे हो, कुछ और लब्ज पे नाम न लो।।
रात दिवाली, दिन थे होली, हर मौसम था सावन जैसा। सुबह सुनहरी धुप खिली थी, शाम का रंग मनभावन जैसा।। राह सजा रखा है कबसे, और कहीं कोई काम न दो। पीने दो नज़रों से बरबस, हाथों में कोई जाम न दो।।

अपने ही रूठा करते हैं, टुटा करते घर में दिल। जितना मन के पास हो कोई, टीस उठे उतनी मुश्किल।। हाथ मिलाओ, गले लगाओ, नफरत भले तमाम न हो। हम हों, तुम हों, कल हों लेकिन, ऐसी कोई शाम न हो।।

अंतर्मन को जीत सको तो, जीत हार के मायने क्या। जीत हो उसकी, हार हो जिसकी, मेरा और तुम्हारा क्या।। दर्पण जैसा सच रिश्ता ये, सरे-राह बदनाम न हो। मैं तुममे, तुम मुझमे छुप लो, किस्सा अपना आम न हो।।

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