नए पड़ाव

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'नए पड़ाव' कविता मर्मस्पर्शी होने के साथ ही पाठक को जोश और देशसेवा से ओतप्रोत करने में पूरी तरह सक्षम है। यह देशभक्ति कविता वीर रस की उत्कृष्ठ कविताओं में अपनी एक अलग पहचान रखती है।

नित नए पड़ाव को, जिंदगी के दाव को,
बढ़ा कदम पार कर, धुप, धुल, छाँव को।


कहीं बहार आएंगे, कहीं फुहार आएंगे,
फूल-फूल, गली-गली, शूल-शूल, शहर-शहर।
निर्विघ्न निर्विकार को, न डर किसी पहाड़ को,
चले चलो नहर-नहर, खेत, गाँव-गाँव को।

नित नए पड़ाव .......
बढ़ा कदम पार .......

खेलते हैं खेल जो, बल से छल-छद्म से,
खोदते हैं खाई-खाई, मतहीन, हीन कर्म से।
शख्त हो, सशख्त हो, भुजा उखाड़ तार-तार,
विध्वंश अंश-अंश कर, निर्मूल मूल घाव को।

नित नए पड़ाव .......
बढ़ा कदम पार .......

खोखले विचार पर, व्यभिचार अत्याचार पर,
भेड़ के समाज में, भेड़ियों पर वार कर।
वार कर, प्रहार कर, न बैठ हार-हार कर,
सुबह-सुबह, शाम-शाम, न रोक बढ़ते पाँव को।

नित नए पड़ाव .......
बढ़ा कदम पार .......

जाति-संप्रदाय का, ये कौन बीज बो रहा?
गर्त-गर्त खींचता, ये कौन दिव्य भाल को?
शर्महीन, दिशाविहीन, विषदंत रस में घोलता,
मिटा निशां, निशब्द कर, अलाव में अलगाव को।

नित नए पड़ाव .......
बढ़ा कदम पार .......

जश्न अपनी हार का, मनुज के नागफांस का,
कौन रच रहा यहाँ, कथा महाविनाश का?
काट- काट जाल-जाल, लिप्त-लिप्त हाथ को,
फन-फन कुचल-कुचल, विश्व के बदलाव को।

नित नए पड़ाव .......
बढ़ा कदम पार .......




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नए पड़ाव



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