तेरे बगैर

तेरे बगैर

तेरे बगैर
तेरे बगैर

तेरे बगैर दिल का कोई जख्म हरा सा है।
क्यों तेरे रुखसत का है गम, क्यों मेरा मन डरा सा है?

====

चांदनी रात में रौनक है सारी कायनात मगर,
अँधेरा फिर भी मेरे मुंडेर पर जरा सा है।
संभाले कौन मुझे मेरे हालत पे आज?
किसे है होश यहाँ, कहाँ कोई खड़ा सा है?

तेरे बगैर दिल का कोई जख्म हरा सा है।
क्यों तेरे रुखसत का है गम, क्यों मेरा मन डरा सा है?

====

बनाये कौन बहाना, दिलासा किस भरोसे दूँ?
अभी बरसों बाद फिर, मिलने को दिल अड़ा सा है।
मिलता नहीं है एक भी, इंसान आदमी में।
ये मुर्दों का शहर है, यहाँ सब मरा सा है।

तेरे बगैर दिल का कोई जख्म हरा सा है।
क्यों तेरे रुखसत का है गम, क्यों मेरा मन डरा सा है?

====

कटते नहीं है लम्हें अब इंतजार के तेरे।
ये मेरे सब्र की इन्तेहाँ है या दिन बड़ा सा है?
बयां किससे करें दास्ताँ, सिवा अपने ही अक्स के?
कहाँ खाली कोई अपना, सब भरा सा है।

तेरे बगैर दिल का कोई जख्म हरा सा है।
क्यों तेरे रुखसत का है गम, क्यों मेरा मन डरा सा है?

====

'तेरे बगैर' कविता आपको कैसा लगा हमें बताएं। शेयर, लाइक और कमेंट करें।

Comments

Post a comment