कोरोना से बचाव - प्रकृति का कहर

कोरोना से बचाव - प्रकृति का कहर

कोरोना से बचाव - प्रकृति का कहर
कोरोना से बचाव - प्रकृति का कहर


हवा में फैला ये जहर कैसा?
कोरोना है ये कहर कैसा?
घरों में कैद है मानवजाति,
आ गया बदलाव का ये लहर कैसा?

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चाँद पर पाँव ज़माना बेशक कामयाबी है।
मंगलयान की यात्रा एक मुकाम हमारी है।
विश्व मगर पूछ रहा, ये क्या बीमारी है?
आदमी के दिन लद गए क्या रोबोट की बारी है?

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अशंख्य प्रयोगों का कहीं दुष्परिणाम तो नहीं ये?
छल से किया गया कोई काम तो नहीं ये?
या फिर सृष्टि का है शाम तो नहीं ये?
सुनो आहट गौर से कोई पैगाम तो नहीं ये ?

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अभी भी वक़्त है, लौट चलो प्रकृति की गोद में। 
व्यर्थ मत गंवाओ समय बैठकर किसी शोध में।
खुद ही संवर जायेगी धरती, माँ है हमारी।
आँचल में सुलायेगी, रहोगे मोद में।


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