प्रवासी मजदूर - पैदल पदयात्रा

प्रवासी मजदूर - पैदल पदयात्रा


यह कविता विश्वव्यापी बीमारी कोरोना से जूझ रहे उन तमाम प्रवासी मजदूरों को समर्पित हैं जो हजारों किलोमीटर दूर अपने परिवार और गांव को छोड़कर रोटी की तलाश में शहरों में रह रहें है। 
हजारों किलोमीटर की दूरी को पैदल तय करने निकले उन अनगिनत लोगों को हमारी शुभकामनाये।  भगवान उन्हें सकुशल उनकी मंजिल तक पहुँचने की शक्ति दे।

प्रवासी मजदूर - पैदल पदयात्रा
प्रवासी मजदूर - पैदल पदयात्रा


प्रवासी मजदूर - पैदल पदयात्रा

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शहर  का बोझ ढोता, आया गांव से दूर हूँ। 
मत देखो नफरत से मैं तबके से मजबूर हूँ। 
1
पेट भर रोटी को बाट जोहटे नन्हीं आँखें कई,
बेसहारों का सहारा मैं प्रवासी मजदूर हूँ। 
तेरे शहर में बिकते हैं घूंट का पानी,
एक छांव की तलाश में कट गयी जवानी। 
गुमनाम झुग्गियों का अनजाना सा एक चेहरा,
लौट चला उस देस को जहाँ मैं मशहूर हूँ। 
2
आँखें नम न करना माँ,
कभी मेरा गम न करना माँ,
तेरी मिटटी का कानून अजब है,
जीते जी न मरना माँ। 
घरों में कैद है शहर,
फैला यहाँ कोरोना माँ,
आग पेट की बुझे बिना पर,
होगा कैसे सोना माँ?
3
करता प्रणाम विदाई दो,
मीलों दूर है जाना माँ,
एक पोटली में रोटी और,
दूजी नन्ही किलकारी माँ। 
पग डगमग साँसे रूकती सी,
बुझती नब्ज़ हरजाई माँ,
अंतहीन पैदल पथ मेरा,
उम्र बड़ी या दूरी माँ?
सांस एक बस शेष रहे हो,
माँ की आशा पूरी मा। 
4
जिस मिटटी ने सृजन किया,
उस मिटटी में मिल जाऊँ माँ,
मानव में फिर जनम न देना,
फूल बनूँ खिल जाऊं माँ। 

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